एक किसान की मौत का मतलब एक छोटी फैक्ट्री का बंद हो जाना है।

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किसान की मौत

महाराष्ट्र में देश में सबसे अधिक किसान आत्महत्याएं करते हैं और विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य और केंद्र सरकारें किसानों की उम्मीदों और सपनों को पूरा करने में सफल नही हो पा रही हैं।

राहत और पुनर्वास विभाग ने मार्च से मई 2019 (666 आत्महत्या) की तुलना में लॉकडाउन अवधि के दौरान सबसे अधिक किसान आत्महत्या की सूचना दी।

2001 से मई 2020 तक, राज्य में 34,200 किसानों ने विभिन्न कारणों से अपना जीवन समाप्त कर लिया है।

बंद के दौरान आत्महत्या करने वाले 1,200 किसानों में से केवल 450 को ही सरकारी सहायता मिली है और बाकी प्रस्तावों की जांच अभी भी जारी है।

पिछले 20 वर्षों में अमरावती डिवीजन में सबसे अधिक 15,221 किसान आत्महत्याएं हुई हैं, इसके बाद औरंगाबाद डिवीजन में 7,791 हैं।

Our View –
लॉकडाउन के दौरान बीते 3 महीने में (मार्च-मई) महाराष्ट्र के 1200 किसानों ने जान दी है।

यानी हर महीने: 400
रोज़: 13
हर 2 घंटे में: 1 ज़िन्दगी खत्म

फ़र्क़ यह है कि वे कोई फिल्मी हस्ती नहीं थे। लिहाज़ा कोई नहीं पूछेगा।

मीडिया का कोई एंकर इन पर प्राइम टाइम नहीं करेगा। किसानों की खुदकुशी पर भला कैसी TRP?

 

लेकिन जब एक किसान मरता है तो उसकी ज़मीन को जोतने वाला नहीं होता।

हताशा, अवसाद में उसका परिवार सब-कुछ बेचकर शहर में मजदूरी करने लगता है।

एक खेत साल भर कम से कम 12 लोगों के परिवार का पेट भरता है। वर्षों तक।

एक फैक्ट्री सिर्फ एक को रोजगार देती है। अस्थाई रूप से। घाटा होने या आपदा में वही फैक्ट्री उसे नौकरी से निकाल देती है।

आपने इसी अस्थाई, असमान विकास को चुना है। आपको लगता है कि इंसान का बेहतर भविष्य नौकर बनकर जीने में ही है।

लेकिन किसान अपने खेत का मालिक होता है। वह जो उगाता है, उसे खुद भी खाता है और दूसरों को भी खिलाता है। बिना यह सवाल किए, कि खाने वाला किस जाति, धर्म, सम्प्रदाय का है।

किसान मर रहा है, क्योंकि निज़ाम उसे जीने नहीं देना चाहती। वह उसे मारकर उसकी जमीन हड़पना चाहती है।

निज़ाम वह ज़मीन उद्योगपतियों को दे देती है। वे आप जैसे सैंकड़ों नौकर रखते हैं।

खूब मुनाफा कमाते हैं। सरकारों की झोली भर देते हैं। सरकार इस पैसे को जाति, धर्म, सम्प्रदाय के आधार पर बांटती है।

और इस तरह रोज़ आपका खून चूसे जाने के बाद भी आप नौकर ही रहते हैं। किसान की तरह मालिक नहीं बन पाते।

आज का निज़ाम यही चाहता है कि आप और आपकी पीढियां नौकर बने रहें। मालिक नहीं।

फिर एक किसान की मौत पर 12 लोग बेरोज़गार कैसे नहीं हुए?

एक किसान की मौत का मतलब एक छोटी फैक्ट्री का बंद हो जाना है।

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