धान के पौधे में बीमारी ( रोग ) और रोकथाम ।

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1. बदरा
कारक जीव:  पिरीकुलेरिया ग्रीस्या
लक्षण :पत्तियों पर आंख के आकार के धब्बे बनते हैं।तने पर गांठें चारों ओर से काली हो जाती हैं तथा पौधा गांठ से टूटकर गिर जाता है।ग्रीवा गलन में बालियों के डंठल (ग्रीवा) पर काले धब्बे बनते हैं व ग्रीवा गल जातीहै।प्रभावित बालियों में दाने हल्के व खाली रह जाते हैं।

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अनुकूल मौसम : तापमान 26.6 डिग्री  से 28 डिग्री सैल्सियस, हवा में नमी 90 % से अधिक व बादल छाये रहना।

रोकथाम /सावधानियां

•       बीज उपचार अवश्य करें।

•       बासमती की रोपाइ जुलाइ के पहले पखवाड़े में पूरी करलें।

•       पत्तियों पर लक्षण नजर आते ही 120 ग्रामट्राइसाइक्लाजोल (बीम या सिविक)75 डब्ल्यू पी या 200 ग्रामकार्बेन्डाजिम (बाविस्टीन) या 200 मि.ली. हिनोसान को 200 लीटर पानी  में घोल कर प्रति एकड़ छिड़काव करें। दूसरा छिड़काव 50% बालियां निकलने पर करें।

•       बालियां निकलते समय खेत में सूखा न लगने दें।

2. तनागलन
लक्षण : इस रोग का मुख्य लक्षण भूरे काले रंग के धब्बों के रूप में रोपाई के 2-3 सप्ताह बाद तना तथा पर्णच्छद पर पानी की सतह के पास दिखने लगता है, जो कई सें.मी. तक ऊपर-नीचे फैल जाता है । रोगी पौधे के तने को चीरने पर कपासी-सलेटी रंग के कवक जाल में काले-काले स्कलेरोशियम पाए जाते हैं । जिन खेतों में पानी देर तक ठहरता हो, उनमें पर्णच्छद पर लकीरों में छोटे-छोटे काले पेरीथोसियम बनते हैं । तना सड़ जाता है, जो खींचने पर आसानी से टूट कर उखड़ जाता है । नीचे से २-३ गाठों पर या पानी से ऊपर आपस्थानिक जड़े भी निकलती हैं । तनागलन से रोग ग्रसित पौधे आसानी से गिर जाते हैं ।

रोकथाम/सावधानियां 

•       स्वस्थ बीज का प्रयोग करें। बीज उपचार करने से ही इसका बचाव है।

•       बीज उपचार के लिए 10 लीटर पानी में 10 ग्राम कार्बेन्डाजिम (बाविस्टीन) या 10 ग्राम एमिसान या 2.5 ग्राम पोसामाईसिन या 1 ग्राम स्ट्रैप्टोसार्क्लिईन को घोल लें और इस घोल में 10 किलोग्राम बीज को 24 घंटे तक भिगोयें । इसके बाद बीज को घोल से निकाल कर छाया में पक्के फर्स या बोरी पर ढेर के रूप में डाले व गीली बोरी से 24 से 36 घंटे तक ढक दें। समय समय पर पानी छिडक कर बीज को गीला रखें ताकि अंकुरण हो सके। 

•       धान की पनीरी को उखाड़ने से 7 दिन पहले कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम प्रति वर्ग मीटर की दर से रेत में मिलाकर पनीरी में एक सार बिखेर दें। ध्यान रहे पनीरी में उथला पानी हो। यदि धान की पनीरी बोने से पहले बीज को कार्बेन्डाजिम से उपचारित किया भी हो तो भी यह उपचार अवश्य करना चाहिए। 

•       धान की पनीरी खड़े पानी में उखाड़ें।

•       रोगग्रस्त पौध की रोपाई न करें।

•       रोगग्रस्त पौधों को खेत से निकालकर नष्ट कर दें।

3. बकाने  
कारक:  जिबरेला फयूजीकुरेई
लक्षण : रोपाई के बाद खेत में भी पौधे ऐसे ही पीले, पतले तथा लम्बे हो जाते हैं । रोगी पौधों की सभी दौजियां पीली हरी सी ही निकलती है। अधिकतर पौधे पुष्प गुच्छ निकलने एवं पकने से पहले ही मर जाते है। रोगी पौधों के निचले भागों पर बने कोनिडिया हवा द्वारा स्वस्थ पौधों के पुष्प पहुंचकर  फूलों पर संक्रमण करते हैं तथा रोगग्रस्त दाने बनते है, जो अंकुरण बाद रोग के लक्षण प्रकट करते हैं । में इसी प्रकार के पतले लम्बे पौधे तथा मारता हुआ पौधादर्शाया गया है । उच्च भूमि में धान के पौधों का बिना लम्बा हुए ही तलगलन/ पदगलन के लक्षण पाए गये है । दौजियाँ निकलने या बालियां आने के बाद नमी युक्त वातावरण में तने के निचले भागों पर सफेद से गुलाबी रंग का कवक दिखाई देता है, जो क्रमशः ऊपर की ओर बढ़ता है । मौसम के अन्त में निचले पर्णच्छद का रंग नीला और बाद में काला हो जाता है, जिन पर छोटे-छोटे काले बिखरे हुए पेरीथीसियम बनते है ।
रोकथाम/सावधानियां 

बावस्टीन द्वारा बीज उपचार (0.1 प्रतिशत घोल में 36 घंटे बीज भिगोने) को बकाने के नियंत्रण के लिए अत्याधिक प्रभावकारी(81.3 प्रतिशत नियंत्रण) पाया, इन्होंने तरावडी बासमती किस्म पर उपलब्ध सात कवकनाशियों को परखा था, जिनमें उक्त उपचार सर्वोत्तम पाया गया0.1%सेरेसान के घोल में 48 घंटे तथा इसके 0.2% घोल में 36 घंटे बीज भिगोने पर तलगलन रोग का पूर्ण नियंत्रण पाया 
4. पर्णच्छद गलन
कारक जीव : एक्रो सिलीड्रयम ओराइजी  
लक्षण : नयी बालियों को बनने से रोकता है भूरे धब्बे भी पर्णच्छद तथा कल्लो पर पाए जाते है शुरुआत में धब्बे अनियमित 0.5-1.5 सेमी लम्बे किनारे पर भूरे जो की बाद में बड़े तथा पुरे पर्णच्छद पर फ़ैल जताए है. जब ऊपर के पर्णच्छद इससे पूर्णत  प्रभावित हो जाते है तब बालिया या तो निकलती नहीं है यदि निकलती है तो दाने नहीं बनते है |
नियंत्रण : फसल के गौभ की अवस्था में 200 मि.ली. प्रोपिकोनाजोल (रिजल्ट) 25 र्इ.सी. दवा को 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ छिड़काव करें।
5. पर्णच्छद अंगमारी
कारक जीव:  राइजोक्टोनिया सोलेनी
लक्षण : अनियमित आकार के मटमैले सफेद व हरे धब्बों के रूप में फुटाव से गाभे की अवस्था के बीच दिखार्इ देते हैं जिनके किनारे गहरे भूरे तथा बैंगनी रंग के होते हैं। बाद में इन धब्बों का रंग पुआल जैसा हो जाता है। प्राय: इस रोग के लक्षण शुरू में मेढ़ों के आसपास व खेत में उन जगहों पर पाये जाते हैं जहां खरपतवार हों। अधिक प्रकोप की स्थिति में यह रोग सबसे ऊपर की पत्ती (फ्लैग लीफ) तक पहुँच जाता है। ये धब्बे आपस में मिलकर पूरी की पूरी पर्णच्छद और पत्तियों को झुलसा देते हैं जिसके परिणामस्वरूप बालियों में दाने पूरी तरह नहीं भरते। नमी के मौसम में इन धब्बों के ऊपर फफूँद का कवकजाल व भूरे काले रंग के पिण्ड भी पाए जाते हैं। ये पिण्ड कवकजाल (माईर्लियम) की सहायता से  धब्बों पर चिपके रहते हैं परंतु हल्का सा झटका लगने पर गिर जाते हैं।

रोकथाम/सावधानियां
•       मेढ़ों व खेत में घास (मुख्यत: दूब) न रहने दें।
•       नत्रजन खाद का अधिक प्रयोग न करें।
•       फसल की कटार्इ के बाद ठूँठों को खेत में ही जला दें।
•       लस्टर 37.5% एस ई 400 मि.ली. या शिथमार 450 मि.ली. को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ दो बार छिड़काव करें। पहला छिड़काव रोग की शुरूआती अवस्था में व दूसरा छिड़काव पहले छिड़काव के 15 दिन बाद कर देना चाहिए।
6. भूरी चित्ती रोग
कारक:  हेल्मिन्थोस्पोरियम ओराईज़ी
लक्षण: काले, भूरे और गोलकार धब्बे पत्तों और दानों के छिलकों पर बन जाते हैं। पत्तों पर इन धब्बों के बीच का भाग मटमैला सफेद या राख के रंग का होता है। कई धब्बे आपस में मिलकर बड़ा रूप ले लेते हैं और पत्तियों को सुखा देते हैं। अन्त में धब्बों के बाहर पीले रंग का एक छोटा सा चक्र बन जाता है।
रोकथाम
•  बोने से पहले बीज का उपचार करें।
•  मैन्कोजेब 600 ग्राम 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़कें। आवश्यकतानुसार 15 दिन के बाद फिर छिड़काव करें।
7. आभासी कंडुआ
इस बीमारी का प्रभाव बालियों में किसी-किसी दाने पर होता है। प्रभावित दाने आकार में काफी बड़े व घुंघरूओं जैसे होते हैं। रोगग्रस्त दानों के फटने पर उनमें नारंगी रंग का पदार्थ दिखा देता है जो वास्तव में फफूँद होता है। शुरू में इन घुंघरूओं का रंग सफेद, फिर पीला व बाद में काला हो जाता है।
रोकथाम/सावधानियां   
•  खाद का प्रयोग संतुलित मात्रा में करें।
•  बीजाणु रहित बीज बोयें।
•  रोपाई के छ: सप्ताह बाद नत्रजन खाद का प्रयोग न करें ।
•  कॉपरआक्सीक्लोराई नामक दवा का छिड़काव 500 ग्राम प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में मिलाकर 50% बालियां निकलने पर करें।
नोट :  पावर स्प्रेयर से इस दवा को न छिड़कें क्योंकि ऐसा करने से दानों का रंग काला हो जाता है।

8. जीवाणुज पत्ता अंगमारी 
कारक: जैन्थोमोनास ओराइज़ी
जीवाणुज पत्ता अंगमारी के लक्षण की दो मुख्य अवस्थायें हैं। अधिक हानिकारक अवस्था को क्रैसक कहते हैं। यह अवस्था हरियाणा में बहुत कम देखने को मिलती है।
•  रोपार्इ के 1 से 6 सप्ताह के बीच रोगग्रस्त पौधों की शुरू में गौभ सूखने लगती है तथा पत्तियां पीली होकर सूख जाती हैं। बाद में रोगी पौधे मर जाते हैं तथा इनके तनों को काटकर दबाने से पीला-सफेद चिपचिपा पदार्थ निकलता है।
•  पत्तियों के एक या दोनों किनारों से या कभी-कभी मध्य सिरा के साथ ऊपर से नीचे की ओर पीले सफेद रंग की लहरदार धारियां बनती हैं। बाद में पत्ते सूख जाते हैं।
•  नमी वाले मौसम में पत्तियों पर जीवाणुओं की बूंदें -सी नजर आती हैं। ये बूंदें सूखने पर सख्त हो जाती हैं और बाद में पीली हो जाती हैं या इनकी सफेद पपड़ी-सी बन जाती है।
रोकथाम :
•  प्रमाणित बीज का ही प्रयोग करें ।
•  बोने से पहले बीज का उपचार करें। 
अगेती व घिनकी रोपाई न करें तथा नत्रजन खाद का अधिक प्रयोग नकरें। खाद का प्रयोग संतुलित मात्रा में करें।
•  रोगग्रस्त खेत का पानी रोगरहित खेत में न जाने दें।
•  रोगरोधी/सहनशील किस्में जैसाकि एच के आर 120 और आई आर 64 की रोपाई करें।
9. जीवाणुज़ पत्ती रेखा (Bacterial Leaf Streak)
कारक: जैन्थोमोनास ओराइज़ी पीवी. ओराइज़िकोला
लक्षण: आरम्भ में पत्तियों की समानान्तर शिराओं के बीच हल्के-पीले रंग की पतली-पतली धारियां बनती हैं। ये धारियां धीरे-धीरे लम्बाई में बढ़कर पीले रंग की लाइनें-सी  बनाती हैं। इन धारियों पर नमी होने पर चमकीला पीला जीवाणुज पदार्थ नजर आता है जो बाद में सूख जाता है। कई समानान्तर धारियां मिलकर बड़े धब्बे का रूप ले लेती हैं और पत्तों को सुखा देती हैं। हरियाणा में इस बीमारी का प्रकोप कम होता है।
रोकथाम
•    बीज उपचार करके बिजाई करें
10. बदरंगे दाने
इस रोग के लक्षण दानों पर छोटे या बड़े आकार के धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं।ये धब्बे दाने के छिलके व चावलों पर भूरे, काले, लाल व अन्य रंगों के भी हो सकते हैं। बालियों में कुछ दाने अधमरे व खाली रह जाते हैं।
रोकथाम
50 प्रतिशत बालियाँ निकलने पर 200मि.ली. प्रोपिकोनाजोल (रिजल्ट) 25 ई.सी. दवा को 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ छिड़काव करें।
11. टुंग्रो  
टुंग्रो कारक: टुंग्रो वाइरस  
लक्षण: रोग-ग्राही किस्मों की पत्तियों का रंग संतरे के रंग का या भूरा पीला हो जाता है, जबकि अपेक्षाकृत कम रोगग्राही किस्मों की पत्तियों का रंग हल्का पीला होता है । प्रारम्भ में संक्रमण होने पर पौधे छोटे रहेगें, जबकि, बाद के संक्रमण में पौधे की लम्बाई पर उतना प्रभाव नहीं पड़ता । पत्तियों का बदरंगापन प्रायः सिरे से आरम्भ होकर नीचे की ओर बढ़ता है । रोग्रस्त पौधों की कोमल पत्तियों पर शिराओं के समानान्तर पीले हरे से लेकर सफेद रंग की धारिया बनती हैं । रोग ग्रस्त पौधों में बालियां देर से तथा छोटी निकलती हैं, जिनमें दाने नहीं होते अथवा बहुत हल्के होते हैं । दानों के ऊपर गहरे भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं ।
नियंत्रण: केवल रोग रोधी किस्में ही उगाएं । धान की कटाई के बाद डठलों तथा दौजियों को नष्ट कर दें और धान की पेडी (Ratoon) फसल न उगाएँ । पौदशाला में बिजाई से पूर्व 30 से 35 कि.ग्रा. कार्बोफ्यूरान 3 जी. अथवा 12 से 15 कि.ग्रा. फोरेट 10 जी प्रति हैक्टर ऊपरी 2 से 3 सें.मी. मिट्टी में मिला दें । बिजाई के 15 से 25 दिन बाद मोनोक्रोटोफास ३६ ई.सी. अथवा कार्बेरिल 50 डब्ल्यू. पी. अथवा फोस्फेमिडोन 85 डब्ल्यू. एस.सी.को0.5 कि.ग्रा.ए.आई. प्रति हैक्टर छिड़काव करें । इन उपायों से हरा तेला नियंत्रित किया जा सकेगा । प्रारम्भ में दिखाई देने वाले रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर जला दें, ऐसा करना संक्रमण का आधार समाप्त होने में सहायक होगा ।

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