Sweet Sorghum :गन्ने के साथ करे स्वीट सोरगम यानि मीठी चरी की खेती, दोगुना होगा मुनाफा

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Sweet Sorghum
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किसानों की आय को दोगुनी करने के उद्देश्य से सरकारे समय समय पर कदम उठाती रहती हैं।
इसी कडी में सरकार अब स्वीट सोरगम यानि मीठी चरी की खेती को बढावा देनें में लगी हैं जिससे किसानो की आय बढने के साथ साथ चीनी मिलों को भी अतिरिक्त मुनाफा मिलेगा। ओर लगे हाथ पर्यावरण संरक्षण भी होगा क्योकि स्वीट सोरगम पर्यायवरण के लिए काफी फायदेमंद है। स्वीट सोरगम से न सिर्फ चीनी मिलेगी, बल्कि इथेनॉल भी प्राप्त होगा । राष्ट्रीय शर्करा संस्थान ने हैदराबाद के भारतीय कदन्न अनुसंधान संस्थान के सहयोग से स्वीट सोरगम की नौ प्रजातियों पर काम शुरू कर दिया है। इन्हेंं इसी वर्ष मार्च के महीनें में संस्थान के फार्म में बोया गया था। अब फसल पुरी तरह तैयार हो चुकी है, उनमें इथेनॉल और चीनी की मात्रा का पता लगाया जा रहा है। सभी प्रजातियों की उत्पादकता, गुणवत्ता और रोग प्रतिरोधक क्षमता का आकलन भी साथ ही साथ किया जा रहा है। संस्थान के विशेषज्ञ देख रहे हैं कि अंतर फसल पद्धति के माध्यम से गन्ने के साथ मीठी चरी की खेती करना कितना लाभदायक है।

स्वीट सोरघम की खेती से क्या फायदा होगा

एनएसआइ के निदेशक प्रो. नरेंद्र मोहन के मुताबिक देश में पेट्रोल में इथेनॉल के 10 फीसद मिश्रण के लक्ष्य के लिए 3500 मिलियन लीटर इथेनॉल की जरूरत है । जबकि देश में उत्पादित इथेनॉल से अधिकतम पांच फीसद ही इथेनॉल का पेट्रोल से मिश्रण हो पा रहा है।बाकी का इथेनाल हमें बाहर से आयात करना पड रहा है।जोकि हमारे देश पर एक अतिरिक्त बोझ है। इस कमी को स्वीट सोरघम काफी हद तक पूरा कर सकता है। पर्यावरण की शुद्धता के लिए स्वच्छ जैव ईंधन की बहुत ज्यादा जरूरत है। इस संस्थान में नौ की नौ प्रजातियों को दो अलग अलग तरह से लगाया गया है। पहले तरीके में उन्हेंं अलग अलग खेतों मे लगाया है । जबकि दूसरे तरीके में गन्ने के बीच में बोया गया है। गन्ने के साथ बेहतर पैदावार मिलने पर किसानों को अतिरिक्त लाभ मिल सकेगा।

फैक्ट्री में शुरू हो चुका है उत्पादन

सहायक आचार्य डॉ. अशोक कुमार ने बताया कि सिर्फ लैब में ही शोध नहीं हो रहा है । बल्कि संस्थान की फैक्ट्री में इसका उत्पादन भी शुरू हो चुका है। प्रारंभिक परीक्षण में मीठी चरी में 52 फीसद रस और 12 फीसद चीनी पाई गई है। प्रति टन में 50 लीटर इथेनॉल की मात्रा मिली है। इथनॉल का उत्पादन कृषि पद्धति, पेराई और अनुकूल प्रसंस्करण प्रक्रिया के माध्यम से बढ़ाया जा सकता है।

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