स्ट्राबेरी की खेती के बारे में पुरी जानकारी । जलवायु, मिट्टी से लेकर कमाई तक सब यहीं

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भारत में पहली बार स्ट्राबेरी की खेती का प्रयास उत्तर प्रदेश तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में 1960 के आसपास किया गया , पर तकनीकी ज्ञान की कमी के कारण इसकी खेती सफल ना हो सकी।

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आज आधुनिकता की वजह से अधिक उपज देने वाली किस्में, तकनीकी ज्ञान, परिवहन की सुविधा, शीत भण्डारण यानि की कोल्ड स्टोरोज होने की वजह से स्ट्राबेरी की खेती फायदे का सौदा बन गई है।

जैम, कैंडी आदि बनाने वाली मल्टीनेशनल कंपनी स्ट्राबेरी की खेती को बढावा दे रहे हैं।

स्ट्राबेरी के फायदे

स्ट्राबेरी विटामिन और प्रोटिन के साथ साथ केलशियम व फास्फारस का भी एक बहुत अच्छा स्त्रोत है। पर हर 100 ग्राम स्ट्राबेरी में 90 ग्राम पानी होता है । मतलब इसके खाने से शरीर में पानी की कमी नहीं होती

स्ट्राबेरी की खेती के लिए फायदेमंद जलवायु

स्ट्राबेरी की खेती ठंडे इलाकों में की जाती है। बाकी मैदानी इलाकों जैसे हरियाणा,पंजाब व मध्यप्रदेश में सिर्फ सर्दियों में ही स्ट्राबेरी की खेती हो सकती है
उत्तर भारत में पौधे अक्टूबर-नवम्बर में लगाए जाते है। जबकि फल फरवरी-मार्च में तैयार हो जाते है।

भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान के शिमला केन्द्र में किये गए शोध बताते हैं कि दिसम्बर से फरवरी माह तक स्ट्राबेरी की क्यारियाँ प्लास्टिक शीट से ढँक देने से फल एक माह पहले तैयार हो जाते हैं और उपज भी 20 प्रतिशत अधिक हो जाती है।

जिन क्षेत्रोंं में हवांए ज्यादा चलती हैं वहां स्ट्राबेरी की खेती फायदेमंद नही है।

स्ट्राबेरी की खेती के लिए कैसी मिट्टी चाहिए व खेत को कैसे तैयार करें ?

इसकी खेती हल्की रेतीली से लेकर दोमट चिकनी मिट्टी में की जा सकती है।

स्ट्राबेरी की खेती के लिए पहले क्यारियां बनाई जाती हैं।

सामान्यतया 150 सेमी लम्बे तथा 60 सेमी चौड़ी क्यारी में दस पौधे रोपे जाते हैं। खाद तथा उर्वरकों की मात्रा मिट्टी की उपजाऊ शक्ति व पैदावार पर निर्भर होती है। क्यारियों में अच्छी तरह गली-सड़ी 5-10 किलो गोबर की खाद और 50 ग्राम उर्वरक मिश्रण – कैन, सुपर फास्फेट और म्युरेट आॅफ पोटाश 2ः2ः1 के अनुपात में दिया जाता है।

जिस प्रकार टमाटर या अन्य सब्जियाँ उगाई जाती है वैसे ही स्ट्राबेरी की खेती की जाती है।

स्ट्राबेरी के पौधे लगाने की विधि

पहाड़ों में जहां पौधे अगस्त-सितम्बर में लगते हैं वहीं मैदानी क्षेत्रों में अक्टूबर से नवम्बर तक स्ट्राबेरी के पौधे लगाए जाते हैं।

पौधे किसी प्रमाणित नर्सरी से ही लें। पौधे लगाने से पहले पुराने पत्ते निकाल दिये जाने चाहिए केवल एक दो नए उगने वाले पत्ते ही रखने चाहिए।

मिट्टी से होने वाले रोगों से बचने के लिये पौधों की जड़ों को कुछ फर्टिलिटी बढाने वाली दवाओं के साथ उपचार करें।
क्यारियों में कतार-से-कतार तथा पौधे-से-पौधे का अन्तर 30 सेमी रखा जाता है।

पौधा लगाने के समय क्यारियों में लगभग 15 सेमी गहरा गड्ढा बनाकर पौधा लगाकर उपचारित जड़ों के आस पास अच्छी तरह दबा दिया जाता है। ताकि जड़ों तथा मिट्टी के बीच हवा न रहे। पौधे लगाने के बाद हल्की सिंचाई आवश्यक है।

स्ट्राबेरी की खेती के लिए उन्नत किस्में

उन्नत किस्मों में मुख्य ट्योगा, टोरे, एन आर राउंड हैड, रैड कोट, कंटराई स्वीट आदि है, जो ज्यादातर छोटे आकार के फल देती है। आजकल बड़े आकार वाली किस्में देश में बाहर से मंगवाई जा रही है जिनमें चाँडलर कनफ्यूचरा, डागलस, गारौला, पजारों, फर्न, ऐडी, सैलवा, ब्राईटन, बेलरूबी, दाना तथा ईटना आदि प्रमुख है।

स्ट्राबेरी की खेती की उपज किस्म और जलवायु पर निर्भर करती है।

स्ट्राबेरी की खेती में सिंचाई कैसे करें तथा फसल की देखभाल कैसे करें

स्ट्राबेरी की फसल को बार-बार परन्तु हल्की सिंचाई चाहिए होती है। सामान्य परिस्थितियों में सरदियों में 10 से 15 दिन तथा गरमियों में 5 से 7 दिन के अन्तराल में सिंचाई जरूरी है।

ड्रिप सिंचाई विधि सबसे बेहतर सिंचाई की विधी है। सिंचाई की मात्रा मिट्टी की स्थिती तथा खेत की भौगोलिक स्थिती पर निर्भर रहती है।

स्ट्राबेरी की क्यारियों को प्लास्टिक की चादर से ढँकने के बहुत फायदे हैं। इसके कारण मिट्टी में नमी रहती है, खरपतवार भी नियंत्रण में रहती हैं।

इस चादर से फलों का सड़ना कम हो जाता है।

स्ट्राबेरी का पौधा पहले वर्ष से ही फल देने लग जाता है।

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स्ट्राबेरी की खेती को खराब करने वाले कीट और उनका नियंत्रण

स्ट्राबेरी की खेती को तेला, माइट, कटवर्म तथा सूत्रकृमि जैसे कुछ कीट नुकसान पहुचाते हैं।

जिनको खत्म करने के लिए डीमैथोयेट, डिमैटोन, फौरेट आदि का प्रयोग किया जाता है।

स्ट्राबेरी की तुड़ाई

जहां पहाडो में मार्च से मई तक फसल पक जाती है वहीं मैदानी क्षेत्रों में फरवरी के आखिरी सप्ताह से मार्च महीने तक फल पकने शुरू हो जाते हैं।

फल के आधे से अधिक भाग का लाल होना तुड़ाई के लिए सबसे उचित समय होता है।

फलों की तुड़ाई के समय इकट्ठा कम गहरी टोकरियों में ही करनी चाहिए। खराब फलों की छँटनी जरूर करनी चाहिए। फल तोड़ने के दो घंटे भीतर तक शीत भण्डारण यानि कोल्ड स्टोरेज करने से फलों की उमर बढ जाती है।

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