कृषि कानूनों के विरोध में हरियाणा भाजपा नेता Parminder Singh Dhull और Ravinder Dhull ने दिया Resign

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Parminder Singh Dhull कृषि कानूनों के विरोध में हरियाणा भाजपा नेता परमिंदर सिंह ढुल और सरकार के अतिरिक्त अधिवक्ता रविन्द्र ढुल ने दिया इस्तीफा

Parminder Singh Dhull – आज हरियाणा भाजपा के लिए एक बहुत ही चोकाने वाला दिन रहा। जहा पार्टी के वरिष्ठ नेता Parminder Singh Dhull ने कृषि कानूनों के विरोध में भाजपा पार्टी से इस्तीफे दे दिया । वहीं उनके बेटे और हरियाणा सरकार के अतिरिक्त अधिवक्ता रविन्द्र ढुल ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। दोनों नेताओं ने फेसबुक के माध्यम से पोस्ट लिख यह सूचना दी।

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Parminder Singh Dhull
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पार्टी को लिखे पत्र में Parminder Singh Dhull ने लिखा कि

मुख्यमंत्री, हरियाणा प्रदेश को खुला त्यागपत्र:

महोदय,

आज आपको पुनः सत्ता सम्भाले लगभग एक वर्ष हो चला है। चुनावों के दौरान कृषि व्यवस्था सुधारीकरण व किसान की आर्थिक दशा सुधारे जाने के आपकी पार्टी के स्पष्ट वायदों व घोषणापत्रों के चलते किसानों, मज़दूरों व छोटे व्यापारियों ने आपको लोकसभा व विधानसभा चुनावों में भरपूर समर्थन दिया था। उन्हें उम्मीद थी कि गत एक दशक से भी लम्बे समय से स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करवाने का उनका संघर्ष आखिरकार सिरे चढ़ेगा।

इसी प्रकार किसानों व मज़दूरों को लगता था कि सरकार की तरफ से मासिक वेतन अथवा पेंशन पाने का उनका हक भी आखिरकार उन्हें मिल पायेगा। आपको याद दिलाना चाहूंगा कि जब विधानसभा के सदन में सर्वप्रथम मेरे द्वारा किसानों की इस वाजिब मांग को ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से एक बार नहीं बल्कि बारम्बार रखा गया था तो आपने भी सदन में इसकी अनुशंसा की थी।

महोदय, मेरे पिता स्वर्गीय चौधरी दलसिंह जी एक स्वतंत्रता सेनानी थे। अपने जीवनकाल में जब तक वह राजनीति में सक्रिय रहे तो प्रदेश में विपक्ष की रीढ़ साबित हुए। उन्हीं के चरणों में बैठकर मैंने गरीब किसान व मज़दूर के लिए लड़ना सीखा है। आपको याद भी होगा कि आपने जब मुझे पार्टी में शामिल करवाने का आग्रह किया था तो मैंने इन्हीं लोगों के भलाई से जुड़े कुछ अहम मुद्दे आपके समक्ष शर्त के रूप में रखे थे।

क्षेत्र के विकास के अलावा मैंने जो नीतियां आपके समक्ष रखीं थीं आपने अपनी पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष से उनपर मंजूरी प्राप्त कर ही मुझे पार्टी में शामिल करवाया था। मुझे खेद है कि आज आप जब पुनः सत्ता के मुखिया बन बैठे हैं तो उन तमाम विषयों को तिलांजलि भी दे चुके हैं। मैं चुप था क्योंकि मुझे थोड़ी सही मगर उम्मीद की किरण जरूर नज़र आ रही थी।

और अब आपने केन्द्र सरकार द्वारा थोपे गए नए कृषि क़ानूनों पर आंख बन्द करते हुए हामी भर ली है। महोदय, एक मुख्यमंत्री होते हुए आपका काम केंद्रीय नेतृत्व का क्लर्क बनना नहीं अपितु प्रदेश की जनता के हितों के प्रति समर्पित रहते हुए संवेदनशील बनना व उनके प्रति उदारता दिखाना होता है।

आज प्रदेशभर के किसान आपकी तरफ उम्मीद भरी निगाहों से टकटकी लगाए देख रहे हैं। मगर आपने उनकी उम्मीदों के साथ न्याय न करते हुए इन कानूनों को लागू कर किसानी की अस्मत पर हाथ डाला है। जो किसान अब से पहले न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने के लिए लड़ता था वह अब न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था को बचाने के लिए लड़ रहा है।

जुलाई में जब केंद्र सरकार ने जबरन कृषि अध्यादेशों को हरियाणा की जनता पर थोपने का कार्य किया तो उसके बाद अगस्त प्रथम सप्ताह में हरियाणा सरकार की ओर से मुझे इन अध्यादेशों के ऊपर अपने विचार रखने के लिए चंडीगढ़ हरियाणा निवास में बुलाया गया। मैंने इन अध्यादेशों के ऊपर अपने विचार रख सरकार से माँग रखी के इन अध्यादेशों को तुरंत वापिस लिया जाए एवं विभिन्न सुधार जैसे न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे प्रावधान इनके अंदर शामिल किए जाएँ।

लेकिन इन सब बातों को दरकिनार करते हुए सरकार ने अध्यादेशों को क़ानून बना जबरन लागू करवाने का काम किया और विरोध करने पर भोले भाले किसानों पर लाठियाँ बरसाई गयीं। आज हालत ये है कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान लगभग सात किसानों की मृत्यू हो चुकी है। मैंने अपने विचारों को विभिन्न मंचों पर भी रखने का काम किया। जहां एक ओर हरियाणा सरकार एवं हरियाणा भाजपा दावा करती रही के मंडी व्यवस्था को चालू रखा जाएगा एवं ख़रीद केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही होगी।

वहीं दूसरी ओर विभिन्न मंचों पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने एपीएमसी एक्ट को बिहार की तर्ज़ पर ख़त्म करने की बात की। इन दोहरे मापदंडों की वजह से जिस कृषि व्यवस्था को दीनबंधु चौधरी छोटू राम ने स्थापित किया था आज वह कृषि व्यवस्था ही ख़तरे में पड़ गयी है। सुधारीकरण दूर बल्कि आपने तो स्थापित व्यवस्था को ही तहस नहस कर डाला है। किसान लगातार तीन माह से सड़क पर है लेकिन सरकार के कानों पर जू तक नहीं रेंगती।

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इसी बीच मेरे द्वारा विधानसभा समेत विभिन्न मंचों पर उठाई गयी किसान वेतन आयोग की माँग को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। महोदय, शायद आप स्वयं को नहीं मानते मगर मैं मानता हूँ कि एक प्रजातांत्रिक प्रणाली का हिस्सा होने के नाते से गरीब व आमजन की आवाज़ बनना मेरा परम् कर्तव्य है।

पार्टी की सदस्यता से पहले मैं किसान पुत्र होने के मेरे दायित्व के निर्वहन को अधिक महत्त्वपूर्ण मानता हूँ। मैं आपको याद दिला दूँ कि दीनबंधु चौधरी छोटू राम के बाद हरियाणा के सबसे बड़े किसान नेता के रूप में स्थापित हो चुके जननायक चौधरी देवी लाल ने अपने सत्तर साल के राजनैतिक जीवन में 16 बार विभिन्न पार्टियों को लात मारी थी लेकिन किसान हित कभी नहीं छोड़ा।

मुझे सौ बार भी किसी ऐसी राजनैतिक पार्टी एवं सत्ता सुख को लात मारने में हिचक नहीं होगी जो किसान विरोधी विचारधारा को आगे बढ़ाएंगे। किसान की चिता पर कथित विकास एवं सत्ता सुख मुझे स्वीकार्य नहीं है। बेशक से आज भारतीय जनता पार्टी सत्ता में है एवं मैं प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में सत्ता का हिस्सेदार हूँ, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं अन्य नेताओं की तरह अपनी अन्तर्रात्मा को मार इस कथित सत्ता सुख का भाग बनूँ।


इन सब कारणों के कारण अब मैं अपने आप को भारतीय जनता पार्टी के अड़ियल किसान विरोधी रवैए के साथ खड़ा होने में असमर्थ पाता हूँ एवं भारतीय जनता पार्टी के सदस्य के रूप में इस्तीफ़ा देता हूँ। मैं किसानों की चिताओं और भविष्य की बर्बादी पर चल रही इस सरकार को लात मारता हूँ एवं इसे जड़ से उखाड़ने का संकल्प लेता हूँ।

Parminder Singh Dhull’s Son Ravinder Dhull

वहीं Parminder Singh Dhull के बेटे और हरियाणा सरकार के अतिरिक्त अधिवक्ता रविन्द्र ढुल ने पत्र में लिखा कि

माननीय अध्यक्ष के नाम खुला पत्र

आदरणीय अध्यक्ष जी नमस्कार, मैं संगठन का आभारी हूँ कि मुझे भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश मीडिया पेनलिस्ट के रूप में कार्य करने का मौका मिला। अध्यक्ष जी मैं आपको आज के ज्वलंत मुद्दे किसान अध्यादेशों की तरफ लेकर जाना चाहता हूँ। मैंने आपको विभिन्न जगह पर इनके समर्थन के बारे में बोलते हुए सुना है लेकिन हर जगह आपके द्वारा कहा गया है कि सभी किसान इसके समर्थन में हैं और विरोध करने वाले पार्टी विशेष के लोग हैं।

पार्टी के द्वारा विभिन्न स्तरों पर आश्वस्त किया गया था कि यदि अध्यादेशों को लेकर किसी पक्ष को कोई आपत्ति होगी तो उसे सुना जायेगा और उनका सोल्यूशन किया जायेगा। लेकिन आपत्तियों के बावजूद कुछ भी नहीं किया गया और विपक्ष की आवाज को दबा कर अलोकतांत्रिक तरीके से बिल को पास करवा दिया गया और बेहद जल्दबाजी में महामहिम राष्ट्रपति से हस्ताक्षर करवा दिए गए।

इसके बाद जब किसानों ने इसका विरोध किया तो उनपर बल पूर्वक लाठीचार्ज करवाया गया। इसका मैंने तब भी विरोध किया था। मैंने इन बिलों के बारे में मेरी आपत्तियों को संगठन के स्तर पर भी दर्ज कराया था लेकिन उनका समाधान अब तक नहीं किया गया है। मैं समझने में असमर्थ हूँ कि जिन बिलों का इतने व्यापक स्तर पर विरोध किया गया उन बिलों को इस प्रकार क्यों पास किया गया?

जहाँ एक ओर भारतीय जनता पार्टी की तरफ से आश्वस्त किया गया कि मंडी व्यवस्था बरकरार रहेगी और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर लगातार खरीद होती रहेगी तो ऐसे में इन बातों का प्रावधान बिल में क्यों नहीं किया गया इसका पार्टी के पास कोई भी उत्तर नहीं है। जिन बिलों का सीधा प्रभाव भारत की सत्तर प्रतिशत आबादी पर पड़ने वाला है

उन बिलों को बिना राज्यों से सलाह लिए क्यों पास किया गया जबकि स्पष्ट तौर पर ये बिल संविधान की सातवीं अनुसूची में आते हैं तथा इसपर कानून बनाने का राज्यों को हक़ है तो ऐसे में ये बिल राज्यों से सलाह के बिना भारत की जनता पर क्यों थोपे गए इसका उत्तर भाजपा के पास नहीं है। जब से इन बिलों को पास कर जनता पर थोपा गया है,

मैं भाजपा का पक्ष लेने के लिए कभी टीवी डिबेट्स में नहीं गया हूँ और न ही अब मेरी आत्मा मानती है कि मैं संगठन की सेवा करूँ। मैं पार्टी का सदस्य बाद में हूँ एवं एक किसान पुत्र पहले अतः मेरे लिए किसान के हित सर्वोपरि हैं एवं ये पार्टी के किसी पद अथवा सम्मान से अधिक हैं। ऐसे में मैं भारतीय जनता पार्टी द्वारा दिए गए पद के निर्वहन में स्वयं को असमर्थ पाता हूँ एवं तुरंत प्रभाव से पार्टी की प्राथमिक सदस्यता एवं भारतीय जनता पार्टी प्रदेश मीडिया पेनलिस्ट के पद से मेरा इस्तीफा देता हूँ।

भवदीय
रविंद्र सिंह ढुल

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